Tuesday, 4 September 2012

एक श्रद्धांजलि फोन को

इस फ़ोन से कुछ अजीब ही रिश्ता था,
कुछ बेहतरीन समय इसने साथ देखे सुने
और; कुछ बेंतहा मुश्किल लम्हे इसने साथ गुजारे,
याद है कैसे बार बार हाथ लपक संभाल लेते थे
इस छोटे से दोस्त को; जब
इसपर ही कंई छोटे बड़े कर्येक्रमो की प्लानिंग होती थी,
घंटो इसे अपने कान से लगा;
कागजों पर आड़े तिरछे अक्षर लिखती रहती,
इस ओर से कुछ बोलती थी;
उस पार से साथी कुछ कहते थे,
फिर भी; एक साझेदारी थी
साथ संघर्ष करने की,
संघर्ष में साथ आगे बढ़ने की;
और ये दोस्त हमसफ़र ही तो था,
हाँ; कभी कभी इसकी बैटरी थक जाती थी,
लेकिन बिजली की तरंगो में खुद को झोंक तैयार हो जाती थी,
एक बार फिर उर्जा भर देने;
दोनों फिर लग जाते थे कुछ सुनने कुछ बोलने,
इस सुनने- सुनाने की प्रक्रिया में कुछ सपने बुनने;
इन सपनो का ताना बाना केवल सामाजिक था,
ये भी पूरा सच नहीं;
इसने भी कुछ अपनों का अंहकार देखा है,
कुछ अपनों का तिरस्कार सहा है;
कुछ संगी साथी इसी पर जुड़े,
कुछ से इसने समय- स्थान अंतर के बावजूद जोड़े रखा;
इसने भी अपनों की प्रतीक्षा
और; इन जटिल संबंधो की समीक्षा दोनों ही की,
इस प्रश्न को इसने भी कंई बार सुना,
- 'आखिर जब रिश्ते जोड़ने हो या तोड़ने
तब अधिकांश लोग क्यूँ फ़ोन की आड़ लेते हैं?'
वही फ़ोन जो बैटरी के बिना चल नहीं सकता;
जिसके बिना उससे कोई स्वर निकल नहीं सकता;
वही जो जब चल पड़ता है, तब एक औजार बन जाता है;
यह इस समय की निर्बलता है, या इस तकनीक की दुर्बलता?
फ़ोन आज फिर भौतिकतावाद में इंसानी रिश्तों का नया स्वरुप समझाता है;
और ना जाने कैसे तसल्ली देते हुए एक सच भी सुनाता है,
'बैटरी-फ़ोन-स्वर-तकनीक' के रिश्ते को नारीवादी लेंस से देख लेना भर नारीवाद नहीं
उसके प्रश्नो की धार में छुपे दंभ की काट ढूंढना नारीवाद है
ये वो दंभ है जो कोई पुरुष किसी महिला को नहीं सिखाता लेकिन जो दृष्टि का हिस्सा बन जाता है,
शरारती चुहल में ये अन्तिम चुटकी लेता है,
'अभी तो तुमने देखा क्या है, आगे आगे देखो इन्टरनेट क्या क्या दिखलाता है';
तब इसे कानो से लगाये, सोचती रह जाती हूँ और ना जाने कब कमबख्त सीने से लग जाता है|


No comments: