Friday, 22 July 2011

बेइत्तिफ़ाक़ि

एक हाथ का पंछी,
एक आस का भंवरा,
कभी आफताब के लिए मचलता है,
कभी बद्र के लिए तरसता है,
अब तुम्हे कैसे कहूं
ऐ दोस्त,
मखरूर मन मेरा,
किस कैफीयत में,
दर बदर भटकता है !
और; अगर कह भी दूं
तो क्या हासिल ?
ना मंज़र में मन मेरा,
ना खुद पे मैं फाज़िल

Thursday, 21 July 2011

Juggler's Act

some words of caution;
and bits of advise,
'love...its nature is abrupt', says akhil
anil says, "these are difficult times"
for; between the two what is it,
that would suffice?
that must survive fire and
cut through ice?
looking for a vise;
I juggle,
when I want to speak about love;
I write about struggle.

Sunday, 17 July 2011

केंचुओं

तुम कहाँ हों ?
गीली मिटटी में गट्ठे पड़े देख;
उनसे गुजरती सुरंग को देखा .
पर तुम नहीं मिले.
तुम्हारी खोज खबर लेने अक्सर निकल पड़ता है मेरा एक दोस्त;
उसे बर्दाश्त नही कि झूले के चाव में मैं तुम्हे भूला बैठूं;
हो सकता है कल के अखबार में गुमशुदा कॉलम में तुम्हारा जिक्र हो;
यह भी हो सकता है कि अपनी बनायीं सुरंगो में तुम गुमसुम बैठे हों,
पर, कहीं खुले में उठते बैठते, गिरगिट से पलटते, उलटते और हर चीज़ पर फिसलते;
दो हाथो से लडखडाती जबान को सँभालते,
इस जीव को देखकर तुम्हे वही तो नहीं हो गया जिसे ये 'Identity crisis' कहता है?
आस्तित्व की इस लड़ाई में हार मत जाना दोस्त,
तुम्हारी मिटटी को इसने रसायनों से भले ही घायल कर दिया हो
पर नरम से कड़क होती अपनी प्रेमिका को तो देखो,
उसका प्रतिरोध ही तुम्हारा होसला है,
तुम्हारे स्पर्श को तरसती,
सरस ही बिखरती
बरबस टकटकी बाँध तुम्हे ढूँढती,
अपनी बेखुदी में बस इतना ही पूछती
...केंचुओं तुम कहाँ हों ?

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India’s soil crisis: Land is weakening and withering